हमारे पति कानपुर के किसी विलक्षण हिन्दी मीडियम विद्यालय के पढे हुये है :– अंजुम रस्तोगी
ये सम्भवतः सन २०१० की बात है। मै सपत्नी शताब्दी ट्रेन से दिल्ली से कानपुर आ रहा था। सामान्यतः शान्त व स्वयं में व्यस्त रहने वाली श्रीमती जी एक युवती सहयात्री से बड़ी आत्मीयता से वार्तालाप करती दिखीं तो ध्यान उस ओर चला गया। बातों से पता चला कि उस सहयात्री का नाम अंजुम मुम्बई से है और उनका ससुराल कानपुर में ही है, बर्रा में लेकिन फिलहाल वो अपने मायके लखनऊ जा रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी शिक्षा दीक्षा तो कान्वेंट स्कूल में हुई है लेकिन उनके पति कानपुर के ही किसी हिंदी माध्यम के विद्यालय से पढ़े हैं। अंजुम जी ने यह भी बताया कि उनके पति अपने स्कूल और अपने सहपाठियों का बहुत बखान करते हैं। लेकिन मेरी श्रीमती जी के पूछने पर भी वो उस हिंदी माध्यम वाले विद्यालय का नाम नहीं बता पा रही थीं, नाम का स्मरण नहीं हो रहा था उन्हें।
खैर… चर्चा आगे बढ़ी तो श्रीमती जी ने आखिर मुझे भी उसमें घसीट ही लिया और बोलीं कि ये भी अपने विद्यालय और पूर्व छात्रों से बहुत लगाव रखते हैं। इनके सहपाठियों और अन्य पूर्व छात्रों में भी आपसी आत्मिक सम्बन्ध हैं। ये कानपुर के पं. दीनदयाल विद्यालय से पढ़े हैं। अचानक नाम सुनते ही वो युवती बोली कि हाँ, हाँ यही तो मेरे भी श्रीमान जी प्रखर रस्तोगी के स्कूल का भी नाम है। फिर क्या था, दूर से चर्चा का आनन्द लेते हुए मुझे भी सक्रिय रूप से इस वार्तालाप में भाग लेना ही पड़ा।
मैंने तुरंत आचार्य श्री दीपक जी को फोन लगाया और उनसे प्रखर रस्तोगी जी के विषय में जानना चाहा। आचार्य जी ने हर बार की तरह इस बार भी अचंभित कर दिया हम सभी को। उन्होंने न केवल नाम की पुष्टि की जबकि यह भी बताया कि प्रखर ने १९९५ में बारहवीं उत्तीर्ण की थी। बर्रा में फलां जगह उनका घर है , उनके पिता फलां विभाग में थे आदि आदि। मने प्रखर जी का पूरा इतिहास भूगोल सब बता डाला आचार्य जी ने। जब मैने अंजुम जी को उनके ससुराल के बारे मे बताना शुरू किया तो सब बातें सुनकर अचंभित और अत्यंत प्रभावित हुईं कि इस विद्यालय का कितना सुदृढ नेटवर्क है कि ट्रेन मे बैठे बैठे परिवार का पूरा विवरण पता कर लिया। जब हमारे वा प्रखर रस्तोगी के बीच को बारह वर्षो का अन्तर है । जब मैने 1983 मे इन्टर किया उस समय तक प्रखर का प्रवेश भी नही हुआ था।
बात आगे बढ़ी तो अंजुम जी ने यह भी बताया कि कानपुर के ठग्गू के लड्डू उनके माता पिता को बहुत पसंद हैं। वो हर बार ले जाने का असफल कर चुकी है क्योकि वे पहले सीधे अपने मायके लखनऊ जाती है इसलिये लड्डू नही ले जा पाती है । दिली तमन्ना तो बहुत है लेकिन क्या किया जाए ट्रेन में होने की मजबूरी है।
अंजुम जी यह सोच कर कुछ उदास थीं । मेरे मन मे भाव आया कि मेरे छोटे भाई की बहूॅ दुखी है तो और मैंने ठग्गू के लड्डू के प्रतिष्ठान के मालिक के दामाद और दीनदयाल विद्यालय के पूर्व छात्र, प्रिय अनुज मनीष कृष्णा जी को फोन किया और उन्हें अंजुम जी के विषय में बताया और उनके मन की इच्छा बताई। शताब्दी ट्रेन ससमय कानपुर सेन्ट्रल स्टेशन पहुंची। अंजुम जी हमलोगों को कोच के दरवाजे तक छोड़ने आईं तो दरवाजे पर ही मनीष कृष्णा जी के एक सहयोगी के हाथों में ठग्गू के लड्डू के डिब्बे देखकर दंग रह गईं। अंजुम जी के चेहरे पर खुशी और आश्चर्य के मिश्रित भाव देखने वाले थे।
एक सप्ताह बाद अंजुम और प्रखर रस्तोगी कानपुर आये तो दोनो पहले विद्यालय गये फिर हमारे घर आये। आज भी अंजुम जी से उस अचानक मुलाकात और अनुज मनीष कृष्णा की आत्मीयता को सोचता हूँ तो पूरा अंतर्मन कुन्तलों ठग्गू के लड्डू की मिठास से भर जाता है।
अजय शंकर दीक्षित
1983 बैच
Leave a Reply