युगभारती प्रार्थना – Prayer

ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥

अर्थ – यह मंत्र ईशावास्योपनिषद का प्रथम श्लोक है, जो बताता है कि इस परिवर्तनशील जगत के कण-कण में ईश्वर व्याप्त है। संदेश यह है कि सांसारिक वस्तुओं का त्यागपूर्वक (अनासक्त भाव से) भोग करें, न कि संग्रह। किसी दूसरे के धन का लोभ न करें, क्योंकि सब कुछ ईश्वर का है, न कि मेरा। 

न त्वहम् कामये राज्यम् न स्वर्गम् नापुनर्भवम्।
कामये दु:खतप्तानम् प्राणिनामार्तिनाशनम्।।

अर्थ – अत्यंत प्रेरणादायक श्लोक राजा रन्तिदेव के नि:स्वार्थ सेवा भाव और करुणा को दर्शाता है। “मैं न राज्य की कामना करता हूँ, न स्वर्ग की और न ही पुनर्जन्म (मोक्ष) की। मैं तो बस दु:ख से पीड़ित प्राणियों के कष्टों को दूर करने की कामना करता हूँ”।

सर्वे भवन्तु सुखिनः | सर्वे सन्तु निरामयाः |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु | मा कश्चित् दुःख भागभवेत्||

अर्थ – “सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।”

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः||